Jeevan Ki Yatra

जीवन की यात्रा
 
जीवन की यात्रा क्या है.ये सोच सोच कर मन परेशान होता रहता है. कुछ समझ में आता है कुछ नहीं. ज्ञान हमें कहां से मिलता है या कौन दे सकता है,नहीं जानते. कुछ इधर-उधर, कुछ किताबों से पढते हैं. कुछ संत-प्रवचन और किसी महापुरुष से विचार सुन कर जो ज्ञान इकठा होता है उस के सहारे हम यह यात्रा आगे बढ़ाते हैं. यात्रा छोटी नहीं है, मंजिल आसान नहीं है. थकावट भी होगी.रास्ता भी भटक जाएंगे. क्योंकि रास्ता जाना- पहचाना नहीं है. ऐसा नहीं है कि एक तय रास्ता है और हमें बस उस पर चलना है और उस मंजिल पर पहुँच जायेंगे. अगर ऐसा हो तो बहुत से लोग जो थोड़ा भी ध्यान परमात्मा कि तरफ लगाते है उस तय रास्ते पर चल कर परमात्मा को पा ना लेंगे. लेकिन हर आदमी को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. उसे ही खोजना है अपना रास्ता और मंजिल तय कर उस तक पहुंचना है.

परमात्मा का मार्ग इसलिए दूर है कि इस मार्ग पर कोई पद-चिन्ह नहीं है जिसका अनुसरण हम कर सकें. और इस का कोई नक्शा भी नहीं बना है कि तुम उसके अनुसार चलो तो मंजिल तक पहुँच जाओगे. यह मार्ग हमेशा खाली रहता है और नया रहता है हर एक के लिए, ताकि जो चाहे अपना पद-चिन्ह बनाकर चल सके. कभी ये मार्ग पुराना नहीं होता. यह वो मार्ग है जो चलने से बनता है. खोजने से मिलता है. जीवन प्रतिपल बदल रहा है एक के लिए जो था वो दूसरे के लिए बदल जायेगा. एक सा हमेशा कुछ नहीं रहेगा और एक बात जान लो किसी के बनाये या बताये मार्ग पर अगर तुम चल भी पड़े तो तुम सत्य की खोज नहीं कर पाओगे और ना ही तुम्हें शांति मिलेगी. परमात्मा जब भी किसी को मिला है हमेशा नया और ओरिजिनल मिला है. ये नहीं कि यह तो उस-उस को मिल चुका है तो पुराना हो गया होगा, नही तुम बिलकुल नए हो उसके लिए और वो बिलकुल नया है तुम्हारे लिए. अगर वो पुराना हो गया होता तो अब तक किसी और के लिए जानने योग्य ना रह गया होता. सुबह की पहली ओस की बूँद और सूरज की पहली किरण की तरह हर सुबह, हर शाम, हर पल नया होता है.

ये बात समझ लेनी है कि संसार एक सराय है. यहाँ रुकना मतलब मृत्यु है. आगे,आगे और आगे ---जब तक कि परमात्मा का द्वार ना मिल जाये तब तक यात्रा जारी रखनी है. इसे बंद नहीं करना है. जब थक जाओ तो विश्राम कर लेना लेकिन वहां रुक कर अपना घर मत बना लेना.

लेकिन अब जानिए कि ये यात्रा और यात्रा का मार्ग सब बाहरी दुनिया के हैं, हमें जो जानना है वह मार्ग अपने अंदर से जाता है और ये यात्रा भी अपने अंदर की ही है. बाहर कि दुनिया जीने या बाहर से परमात्मा कि भक्ति करने या उसकी स्तुति गाने से ये मंजिल नहीं मिलेगी. क्योंकि स्तुति तो ऊपर-ऊपर से होती है. अंदर तो कुछ होश है नहीं. हमें बोल कर परमात्मा को बताने की ज़रुरत नहीं है. वह सब जानता है. हमें उसका ध्यान होना चाहिए. इसका अर्थ है उसका सिमरन करो ,स्मरण करो मन में. सब कुछ करते रहो पर स्मरण उसका रहे. जैसे एक माँ कुछ काम भी करती रहे पर ध्यान उसका अपने छोटे बच्चे कि तरफ रहता है.वह उसके ध्यान से ओतप्रोत है. सब काम बाहर बाहर से ही हो और भीतर से नाता उससे जुड़ा रहे. हर श्वास में वह है, ये जान लो तो तुम्हारी यात्रा शुरू. हर श्वास के आने जाने से तुम परमात्मा में जाते हो, वह तुम में आता है. तब तुम में अनुग्रह कि भावना जागेगी. तुम उसका धन्यवाद करोगे. अहंकार दूर हो जायेगा, मैं नहीं रहेगा और आस्तिकता कि पहली किरण तुम में परवेश करेगी.

इसके लिए संसार छोड़ के जाने की ज़रुरत नहीं है. क्योंकि जो है यहीं है. पर हमें लगता है की वो दूर की दूसरी जगह ज्यादा सुंदर और अनुकूल है. जो हमारे पास है वह कभी भी हमें नज़र नहीं आता. अगर छोड़ कर कहीं जाते भी हो और ध्यान तुम्हारा संसार की तरफ ही रहता है तो जाना बेकार है. पर बीच में रह कर काम करते हुए भी ध्यान उसका है तो तब भी तुम सन्यासी ही हो.

जीवन का मूल्य क्या है,इसका पता तब चलता है जब ये हाथ से छूटता नज़र आता है. जैसे एक बूँद पानी की कीमत मरुस्थल में पता चलती है. जो आज हमारे पास है हम उसे आज नहीं समझ पाते. हम आज को छोड़ कल के लिए कुछ और की तलाश शुरू कर देतें हैं. कुछ ज्यादा पाने की खोज शुरू कर देतें हैं. यह तलाश तो कभी ख़तम नहीं होती, और समय ख़तम हो जाता है. ज्यादा पाने के लिए उसे भी खो देतें हैं जो हमारे पास है. उसका आनंद भी नहीं ले पाते और फिर पछताते हैं. जितना हम खुश होना चाह रहे थे उससे ज्यादा हो सकते थे अगर उस पल को आनंद में जिया होता.

एक कंजूस सारी जिन्दगी धन इकठा करता रहा और उसको खर्च नहीं किया यानि उस धन का उपभोग नहीं किया. जब वह बूढ़ा हो गया तो सोचने लगा कि अब मैं इस धन का क्या करूँ न ही वह किसी को देना चाहता था और न वह उसे उपभोग कर सकता था, क्योंकि अब उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि दुनिया घूमे, खाए-पिए और मस्ती मारे. न ही इस चिंता के मारे वह परमात्मा का नाम लेने में समर्थ था. तब उसे एहसास हुआ कि उसने क्या गलती कि है. अब वह सारा धन देकर भी जिन्दगी के वो अमूल्य पल नहीं खरीद सकता. मृत्युशय्या पर पड़ा वह कहने लगा मुझे जिंदगी न मिले पर एक क्षण मिल जाये ताकि मैं सब को बता सकूं कि मैने क्या गवाया है.

परमात्मा अनन्त है.उसे हम पूरा नहीं जान पाते,जितना जानो उतना और रास्ता खुल जाता है उसकी और जाने का ताकि उसे और जान सकें. वह अनन्त है. वह उस आनंद कि तरह है जिसकी कोई सीमा नहीं है. आनंद भी अनंत है.हम कभी भी उसे पूरा नहीं पा सकते. हर बार हमें लगेगा कि यह बढता ही जाता है. जितना मिलता है हर बार उससे ज्यादा मिलता है. उसकी कोई एक लाइन नहीं लगी हुई कि यहाँ तक पहुँच गए तो बस यहीं ख़तम. परमात्मा को पाना है और उस आनंद को पाना है तो चुप रहना है, बोलना कम है और श्रवण करना है. तब चुप रहकर उसकी आवाज़ को सुनना उसे अनुभव करना तो तुम इस शरीर में कितने ही नए अनुभव करोगे.

Kanchan Bhatia

December 13,2012

 

 

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