Who Am I

मैं कौन हूँ ?

क्या मैं एक शरीर हूँ,या उसकी कोई और परिभाषा है. शरीर के विभिन भाग शरीर का हिस्सा हैं. सब हिस्सों का मालिक मेरा शरीर है या कोई और मैं समझता हूँ  कि मैं मालिक हूँ , और मैं शरीर हूँ . नहीं ऐसा नहीं है ये मुझे गीता बताती है. अगर मैं इसका मालिक नहीं तो कौन है. गीता में कहा गया है कि मैं शरीर नहीं चेतना हूँ. एक भ्रम के प्रभाव में आकर मैं अपने को किसी एक राष्ट्र, एक परिवार, या एक रिश्ते और सम्बन्ध में बंधा महसूस करता हूँ. मेरे (मानव) जीवन का लक्ष्य इस भ्रम से खुद को जगाने और पूरी तरह से आध्यात्मिक प्राणी के रूप में अपने आप को वास्तविक पहचान में जानने का  है. अपने दैनिक जीवन के इस खेल में मैं यह भूल जाता हूँ कि मैं अस्थायी हूँ. इसके पीछे जो सच छिपा है वो भूल गया हूँ. सभी  किसी किसी रूप में काम कर रहे हैलेकिन वास्तव में यह सब मेरी असली पहचान नहीं है. मेरा शरीर एक वस्त्र कि तरह है जो बदलता है वह अस्थायी है और मैं इस वस्त्र कि तुलना दूसरों से करता हूँ यह भूल कर कि यह मेरा भ्रम है. रिश्ते झूठे नहीं हैं, वे असली हैं, लेकिन वे अस्थायी और भ्रामक हैं.
मेरा जन्म होता है पहले बालपन, फिर किशोर अवस्था, फिर जवानी, प्रौढ़ अवस्था और फिर बुढ़ापा आता है और फिर आती है मृत्यु. सभी रिश्ते जो मैंने बनाये, मेरे लिए ख़तम हो जाते है मेरा शरीर खतम हो जाता है और जो मैं वास्तव मैं हूँ यानि मेरी चेतना, मेरी आत्मा को स्थानांतरित कर दिया जाता है दूसरे नए वस्त्र में यानि कि नए शरीर में.

मैं कुछ जानने की इच्छा ही नहीं करता और मान लेता हूँ कि मै शरीर हूँ. मैं इस शरीर के प्रति जागरूक (सचेत, body conscious ) रहता हूँ. परन्तु भागवद गीता ये सिखाती है कि मैं मेरा शरीर नहीं हूँ. यह सिर्फ एक विश्वास नहीं बल्कि अटूट सत्य है. मृत्यु के बाद मेरा शरीर बदल जाता है और सिर्फ मृत्यु के बाद ही नहीं बल्कि मेरे जीवन की अवधि में बचपन से लेकर बुढ़ापा आने तक ये बहुत बार बदलता है. जन्म के समय जो बच्चे का शरीर है, समय के साथ वह सिर्फ बड़ा ही नहीं होता, वह पूरी तरह से बदल जाता है. वह ख़तम हो जाता है और उसकी जगह दूसरा शरीर लेता है. फिर जन्म , फिर मृत्यु और फिर दूसरा और फिर दूसरा. इस तरह से पता चलता है कि मै क्या नहीं हूँ. तो फिर मैं कौन हूँ.

Who am I, Am I the owner of the body or is there any other definition for me. Various parts of the body are part of the body. I think that I am body. If I am not the owner then who is? Bhagvad Geeta says that I am not a body I am a spirit. I am conscious. Under the influence of illusion, I falsely identify myself with my body and think I belong to a certain nation, family, religion, and so on.  The goal of human life is to awaken from this illusion and understand our real identity as I am conscious spiritual being. I am  engaged with my temporary role so deeply that I am  completely forgotten mine true identity. Someone is taking the part as our friend or foe, but actually it is all simply a performance our real identity is something else. My body is nothing more than a costume, but out of illusion identify I  try to relate myself  to others on the basis of these costumes. The relationships are not false , they are real, but they are temporary and therefore create illusion. My body takes birth then moves into childhood, adult age, old age and then death comes—all the different relationships I  had during our lives will be finished, and  only an  individually conscious spirit soul  will be transformed in to a new costume. Childhood body is not just grow but it completely changed into another body for the same soul. The birth, and death, and then another birth and death  and then another. The body which takes birth move to death. In such a way that shows I am not a body then who I am? I am the spirit in the body.

मैं एक आत्मा हूँ, जो इस शरीर में रहने को प्रतिबद्ध है. मेरा शरीर एक पदार्थ है जो  अस्थायी है और लगातार बदल रहा है: बचपन, जवानी, मध्यम आयु, बुढ़ापा, और अंत में मौत. जैसा की ऊपर कहा गया है. लेकिन मैं अपरिवर्तनीय आत्मा हूँ.  भले ही जीवन भर मेरे शरीर में परिवर्तन  होता है और मैं मानता हूँ कि यह मेरी पहचान है और मेरा सब कुछ इस से जुड़ा है फिर भी यह बात सत्य है कि यह पदार्थ है और अस्थायी है. स्थायी क्या है? मेरी आत्मा : जो एक जीवात्मा है, एक भावना है. आत्मा अनन्त है. गीता में कहा गया है आत्मा अमर है. कभी नहीं मरता. इसका कोई आदि है कोई अंत.पदार्थ और आत्मा के बीच के अंतर को समझने की कोशिश ही अध्यात्मिक जीवन है.यह सच्चे आत्मज्ञान का आधार है. इस बात को समझना ही असली ज्ञान है. मैं जो आत्मा हूँ आतंरिक रूप से खुश और ज्ञान से भरा हूँ. लेकिन मानव शरीर मुझे अवसर देता है कि मैं आध्यात्मिक जीवन जी सकूं जो मुझे फिर से इस भौतिक शरीर में आने से मुक्त करेगा जोकि दुखों से भरा है.

I am the soul, or the conscious life force within our bodies .My body is constantly changing infancy, childhood, youth, middle age, old

 age, and finally death. But I am the unchangeable soul. That’s why, even though my body changes throughout the life, I always keep my sense of identity. Body is matter and Matter is temporary, and Soul is spirit that is eternal. Therefore this eternal soul is more important than my body. Understanding the difference between body and soul—between matter and spirit—is the beginning of spiritual life and the only basis for true self-realization. To understand this point is real knowledge. I am- the soul- by nature eternally happy and full of knowledge. The human body affords us the opportunity to perform spiritual activities that will free us from getting further material bodies, which are by nature full of suffering.